Wednesday, November 21, 2018

क्या अहमद शाह ने असावल जीतकर अहमदाबाद या कर्णावती शहर को बसाया

गुजरात के उप मुख्यमंत्री नितिन पटेल ने हाल ही में कहा है कि राज्य सरकार अहमदाबाद का नाम बदलकर कर्णावती करने पर विचार कर रही है.

वहीं, गुजरात के सीएम विजय रुपाणी भी कह चुके हैं कि अहमदाबाद का नाम बदला जा सकता है.

इन बयानों के बाद अहमदाबाद के इतिहास को लेकर एक नई बहस छिड़ गई है. नाम बदलने के पक्ष में खड़े होने वाले और इसकी आलोचना करने वाले अपनी-अपनी तरह से इतिहास की व्याख्या कर रहे हैं.

लेकिन असलियत में अहमदाबाद को बसाए जाने का इतिहास क्या है? क्या ये कर्णावती शहर था जिस पर अहमद शाह ने क़ब्ज़ा करके उसका नाम अहमदाबाद रख दिया?

गुजरात यूनिवर्सिटी में फ़ारसी विभाग के पूर्व प्रमुख छोटूभाई नायक ने अपनी किताब 'हिस्ट्री ऑफ़ इस्लामिक सल्तनत इन गुजरात' में गुजरात के मुसलमान शासकों का ज़िक्र विस्तार से किया है.

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अपनी किताब में वे लिखते हैं कि गुजरात के पहले स्वतंत्र शासक मुज़फ़्फ़रशाह ने अपने चार लड़कों को दरकिनार करके अपने पोते अहमद शाह को अनहिलवाद (पाटन) के सिंहासन पर बिठा दिया था.

मुज़फ़्फ़रशाह के फ़िरोज़ ख़ान, हैबत ख़ान, सादत ख़ान, तातार ख़ान और शेर ख़ान नाम के पांच बेटे थे. अहमद शाह तातार ख़ान के बेटे थे.

लेकिन अहमद शाह के चाचा इतनी आसानी से अपने अधिकार नहीं खोना चाहते थे.

एडवर्ड क्लाइव बेले अपनी किताब 'द लोकल मौह्मडन डायनेस्टीज़: गुज़रात' में बताते हैं कि फ़िरोज़ ख़ान के बेटे मौदूद उस समय बड़ोदा के गवर्नर थे. ऐसे में वे अहमद शाह के चचेरे भाई थे.

मौदूद और उनके पिता फ़िरोज़ ख़ान ने अहमद शाह के ख़िलाफ़ बग़ावत छेड़ने के लिए अमीर मुस्लिमों को अपने साथ मिलाना शुरू कर दिया.

दो हिंदू सरदारों, जीवनदास खत्री और प्रयागदास ने भी इस प्रयास में फ़िरोज़ ख़ान का समर्थन किया.

छोटूभाई नायक अपनी किताब में बताते हैं कि मालवा के सुल्तान हुशांग शाह ने भी अहमद शाह के ख़िलाफ़ बग़ावत में फ़िरोज़ ख़ान का साथ दिया.

कुछ ज़मीनदारों को अहमद शाह के ख़िलाफ़ लड़ाई में शामिल होने के लिए तोहफ़े के रूप में कुछ घोड़े दिए.

अहमद शाह के ख़िलाफ़ खड़ी होने वाली इस सेना का नेतृत्व मौदूद कर रहे थे और उन्होंने जीवनदास को अपने वज़ीर के रूप में नियुक्त किया.

उन्होंने इस युद्ध में लड़ने के लिए एक सेना खड़ी कर ली. जीवनदास ने पाटन पर हमला करने का सुझाव भी दिया. लेकिन कुछ लोगों ने इस प्रस्ताव का समर्थन नहीं किया. कुछ लोगों ने समझौता करने का प्रस्ताव भी रखा.

अब दोनों पक्षों में ये विवाद इतना बढ़ गया कि कुछ लोगों ने इस अभियान से किनारा करके अहमद शाह के साथ हाथ मिला लिया. इसके बाद हुए संघर्ष में जीवनदास खत्री की मौत हो गई.

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