94 साल की उम्र में मृत्यु शोक का विषय नहीं होती. कृष्णा सोबती के संदर्भ में यह शोक और बेमानी हो जाता है, जिनका पूरा जीवन और साहित्य जीवट, उल्लास और जिजीविषा की एक अदम्य मशाल रहा.
हाल के वर्षों में वे मुझे अपने बेहद संक्षिप्त उपन्यास 'ऐ लड़की' की वृद्ध नायिका की याद दिलाती रही थीं, जिसके मन-मस्तिष्क पर उम्र नाम की किसी सलवट, किसी झुर्री का आभास तक नहीं मिलता था.
इसके अलावा हाल के दिनों में वे लगातार बीमार रह रही थीं. बीते साल उन्हें जब ज्ञानपीठ सम्मान दिया जा रहा था तब भी वे आयोजन की जगह अस्पताल में थीं.
लेकिन यह समझना ज़रूरी है कि कृष्णा सोबती के होने का मोल क्या था और उनके जाने का मतलब क्या है. वह कौन सी परंपरा लेकर आईं और कैसी लीक छोड़ कर गई हैं.
कृष्णा सोबती हिंदी में ख़ासकर स्त्री-लेखन के शांत-शीतल तालाब में ऐसे पत्थर की तरह आईं, जिसने पूरे तालाब को हलचलों से भर दिया. बेशक, उनके पहले की नायिकाएं भी स्वतंत्र और स्वाभिमानी दिखती थीं, अपने व्यक्तित्व को खोजती थीं, लेकिन वे बड़ी सुघड़ गुड़ियाओं की तरह थीं, जो अच्छी तो लगती हैं, लेकिन जो ऐसी जीवंत नहीं हैं कि हमें परेशान कर डालें.
कृष्णा सोबती ने पहला काम यही किया कि इन गुड़ियाओं को हाड़-मांस की औरतों में बदला और फिर वह ज़ुबान दी जो मर्दवाद के कान में शीशे की तरह पड़ती थी.
उन दिनों के हिंदी संसार में अपनी देह से घबराई-सकुचाई, उसे छुपाने और उसकी कामनाओं को न दिखाने के लाख जतन करती नायिकाओं ने कृष्णा सोबती के उपन्यास 'मित्रो मरजानी', के प्रकाशन के बाद अचानक पाया कि उनके बीच एक मित्रो खड़ी है जो अपनी दैहिकता को लेकर कहीं भी संकोची नहीं है, वह अपने पति से पिट भी जाती है, लेकिन उसके व्यक्तित्व की जो चमक है, उसमें जो संघर्ष का माद्दा है, वह जैसे ख़त्म होता ही नहीं.
आने वाले तमाम बरसों में कृष्णा सोबती इस जीवट को बार-बार लिखती और जीती रहीं. 'डार से बिछड़ी', 'जिंदगीनामा', 'सूरजमुखी अंधेरे के", 'दिलो दानिश', 'समय सरगम' जैसी ढेर सारी कृतियां हैं जो अलग-अलग किरदारों और कहानियों में ढल कर बार-बार कृष्णा सोबती की अपनी जीवन दृष्टि के बेबाक बयान की तरह सामने आती रहीं.
वे बहुत घनघोर अर्थों में स्त्रीवादी नहीं थीं, शायद ख़ुद को ऐसे किसी विशेषण में ढाले जाने में संकोच भी करती थीं, लेकिन उनके उपन्यासों ने हिंदी लेखन की वह खिड़की खोली, हिंदीभाषी समाज को वह दुनिया दिखाई जिसमें स्त्री होने का मतलब देवी या दासी होना नहीं, हाड़-मांस की वे लड़कियां होना भी होता है जिनकी अपनी इच्छाएं होती हैं, जिनकी अपनी हताशाएं होती हैं, जिनकी अपनी विफलताएं होती हैं, लेकिन इन सबके बावजूद जिनके भीतर लड़ने और जीने का अपना माद्दा भी होता है.
आज अगर हिंदी का स्त्री लेखन ने अपनी एक अलग जगह-ज़मीन और दृष्टि बनाई है तो इसमें कुछ योगदान कृष्णा सोबती के लेखन का भी है.
दरअसल कृष्णा सोबती एक पूरी परंपरा का विस्तार हैं. जिसको समझने के लिए हमें हिंदी के दायरे के बाहर जाना होगा. यह अनायास नहीं है कि बीसवीं सदी के तीसरे दशक में तीन बड़ी लेखिकाएं लगभग एक साथ पैदा होती हैं- महाश्वेता देवी, कृष्णा सोबती और कुर्रतुलऐन हैदर.
तीनों में बस एक-एक साल का अंतर है. इससे कुछ बरस पहले अमृता प्रीतम आती हैं. और उनसे कुछ बरस पहले इस्मत चुगतई.
पता नहीं, भारतीय उपमहाद्वीप में एक ही समय वह कौन सा सांचा था जिसमें विद्रोह की ये मूरतें आकार ले रही थीं, लेकिन इन बहुत सशक्त लेखिकाओं और स्त्रियों ने भारतीय स्त्रित्व का वह परचम फहराया जिसकी शायद मजाज ने कभी उन्हीं दिनों कल्पना की थी-
कृष्णा सोबती के लेखन में जो जीवट दिखता रहा, वही उनके जीवन में भी नज़र आता रहा. बेशक बाद के वर्षों में उनकी कृतियों में बीमारी और बुढ़ापे की छाया दिखती है, लेकिन बेबसी की नहीं.
इस उत्तरकाल में वे 'समय सरगम' जैसा उपन्यास लिखती हैं और उसके बाद भी दो दशक से ज्यादा समय तक सक्रिय रहती हैं. इस सक्रियता के कई आयाम हैं.
करीब दो बरस पहले उनका आत्मकथात्मक उपन्यास 'गुजरात पाकिस्तान से गुजरात हिंदुस्तान' आता है, जिसमें वे विभाजन की त्रासदी के बीच एक छोटी सी रियासत की कहानी कहती हैं और इस बात की तरफ़ ध्यान खींचती हैं कि सरहदों के आरपार चल रही सियासत कितनी तरह के वहशत पैदा करती है, उसने कैसे-कैसे बंटवारे कर दिए हैं.
शायद यह जीवट ही था जिसने कृष्णा जी को लगातार वैचारिक तौर पर सक्रिय बनाए रखा. कुछ वर्ष पहले जब हिंदी के बौद्धिकों ने समाज में बढ़ती असहिष्णुता के ख़िलाफ़ मुहिम चलाई और एक कार्यक्रम रखा तो वहां वे व्हीलचेयर पर पहुंची और उन्होंने 'बाबरी से दादरी तक' की घटनाओं को रेखांकित किया.
उनसे जब-जब मिला, वे बेहद उत्फुल्ल, समकालीन प्रश्नों ही नहीं, बिल्कुल तात्कालिक संदर्भों पर भी उत्सुक दिखीं और हमेशा बराबरी के पक्ष में मुखर नज़र आईं.
दो बरस पहले उनसे मेरी आखिरी मुलाकात उनके घर पर हुई. 92 पार की कृष्णा जी से उस मुलाकात के पहले मेरी पत्नी स्मिता और मैं यह सोच रहे थे वे कुछ अशक्त होंगी.
बेशक, शारीरिक तौर पर वे कुछ कमज़ोर थीं, लेकिन कहीं से अशक्त नहीं दिखीं और दो घंटे तक लगातार कई विषयों पर बात करती रहीं. उनसे मिलकर लौटते हुए हमें लगा कि हमारे भीतर भी एक नई स्मृति का संचार हो चुका है.
वे स्मृतियों से भी लबालब थीं और योजनाओं से भी लैस. वे अस्पताल जा-जा कर लौट आती थीं- जैसे बार-बार किसी अनजान ख़ुदा से इक़बाल का यह शेर कह कर लौट आती हों-
Thursday, January 24, 2019
Wednesday, January 16, 2019
पत्रकार रामचंद्र छत्रपति मर्डर केस- थोड़ी देर में राम रहीम की सजा पर फैसला
पत्रकार रामचंद्र छत्रपति मर्डर केस में डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम को पंचकुला की विशेष सीबीआई अदालत आज सजा सुनाएगी. गुरमीत को सजा वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए सुनाई जाएगी. बता दें कि राम रहीम रोहतक की सुनारिया जेल में बंद है.
गौरतलब है कि 11 जनवरी को कोर्ट ने इस मामले में दोषी करार दिया था. राम रहीम के अलावा 3 और लोगों को आईपीसी की धारा 302 यानी हत्या और 120 बी यानी आपराधिक साजिश के तहत दोषी ठहराया गया है. राम रहीम की सजा को देखते हुए पंचकुला समेत हरियाणा के उन तमाम शहरों में सुरक्षा कड़ी कर दी गई है जहां डेरा सच्चा सौदा का प्रभाव है.
सिरसा में कल पुलिस ने फ्लैग मार्च निकाला. सिरसा में दो महिला पुलिसबल की कंपनी समेत कुल 12 कंपनियां बाहर से मंगवाई गई हैं. यहां सीआरपीएफ की 2 टुकड़ियां को भी अलर्ट पर रखा गया है. इसके अलावा पंचकुला, फतेहाबाद में सुरक्षा सख्त है.
क्या है पूरा मामला
यह पूरा मामला 16 साल पुराना है. साल 2002 में पत्रकार रामचंद्र छत्रपति की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. रामचंद्र छत्रपति लगातार अपने समाचार पत्र में डेरे में होने वाले अनर्थ से जुड़ी ख़बरों को छाप रहे थे. उनके परिवार ने इस संबंध में मामला दर्ज कराया था. उनकी याचिका पर कोर्ट ने इस हत्याकांड की जांच नवंबर 2003 को सीबीआई के हवाले कर दी थी. 2007 में सीबीआई ने कोर्ट में चार्जशीट दाखिल करते हुए गुरमीत सिंह राम रहीम को हत्या की साजिश रचने का आरोपी माना था.
'पूरा सच' अखबार ने किया था खुलासा
सिरसा में हुए दो साध्वियों के साथ हुए रेप की खबर को छत्रपति ने अपने अखबार 'पूरा सच' में छापा था. ये पूरी घटना कई दिनों तक दबी रही थी. इस पूरी घटना का खुलासा जिस गुमनाम चिट्ठी से हुआ वो छत्रपति ने अपने अखबार में प्रकाशित की थी. उस वक्त यह चिट्ठी तत्कालीन पीएम अटल बिहारी वाजपेयी, चीफ जस्टिस पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट, समेत कई संस्थानों में भेजी थी. तीन पेज की चिट्ठी हाथ आने के बाद छत्रपति ने डेरा प्रमुख के बारे में अपने अखबार में छापा था. इसके कुछ दिन बाद ही पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने इस चिट्ठी का संज्ञान लेते हुए सिरसा के डिस्ट्रिक्ट और सेशन जज को इसकी जांच कराने का आदेश दिया. जिसके बाद जज ने यह जांच सीबीआई को सौंपी.
अक्टूबर 2002 में हुई हत्या
अक्टूबर 24, 2002 को छत्रपति पर घर के बाहर कुछ अज्ञात लोगों ने हमला किया. उनकी गोलियों से भून कर हत्या कर दी गई. पिता की हत्या के बाद उनका बेटा अंशुल न्याय के लिए भटकता रहा, लेकिन आखिरकार आज इस मामले में कोर्ट राम रहीम की सजा पर फैसला सुनाएगा.
मामला कब दर्ज हुआ...
पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के चिट्ठी पर संज्ञान लेने के बाद दिसंबर 2002 में सीबीआई की चंडीगढ़ यूनिट ने इस मामले में धारा 376, 506 और 509 के तहत मामला दर्ज किया था और जांच की. इस मामले में राम रहीम को जेल भी हुई थी.
दरअसल, डांस बार मालिकों को किसी भी धार्मिक या शैक्षणिक संस्था से एक किलोमीटर की दूरी पर डांस बार बनाने का आदेश दिया गया था, जिसके बाद डांस बार मालिकों की ओर से इस तरह की प्रतिबंध पर आपत्ति जताई गई और मामला कोर्ट में पहुंच गया. उन्होंने दावा किया है कि बड़े शहरों में इन नियमों का पालन करना संभव नहीं है.
उन्होंने यह भी दावा किया कि 11.30 बजे से डांस बार को बंद करने का एक और प्रतिबंध भेदभावपूर्ण है, जबकि केंद्र सरकार ने व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को चौबीसों घंटे चलाए जाने की अनुमति दे रखी है. डांस बार मालिकों ने सरकार के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि उनका लाइसेंस रिन्यूवल नहीं किया जा रहा है. नए लाइसेंस भी नहीं दिए जा रहे.
गौरतलब है कि 11 जनवरी को कोर्ट ने इस मामले में दोषी करार दिया था. राम रहीम के अलावा 3 और लोगों को आईपीसी की धारा 302 यानी हत्या और 120 बी यानी आपराधिक साजिश के तहत दोषी ठहराया गया है. राम रहीम की सजा को देखते हुए पंचकुला समेत हरियाणा के उन तमाम शहरों में सुरक्षा कड़ी कर दी गई है जहां डेरा सच्चा सौदा का प्रभाव है.
सिरसा में कल पुलिस ने फ्लैग मार्च निकाला. सिरसा में दो महिला पुलिसबल की कंपनी समेत कुल 12 कंपनियां बाहर से मंगवाई गई हैं. यहां सीआरपीएफ की 2 टुकड़ियां को भी अलर्ट पर रखा गया है. इसके अलावा पंचकुला, फतेहाबाद में सुरक्षा सख्त है.
क्या है पूरा मामला
यह पूरा मामला 16 साल पुराना है. साल 2002 में पत्रकार रामचंद्र छत्रपति की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. रामचंद्र छत्रपति लगातार अपने समाचार पत्र में डेरे में होने वाले अनर्थ से जुड़ी ख़बरों को छाप रहे थे. उनके परिवार ने इस संबंध में मामला दर्ज कराया था. उनकी याचिका पर कोर्ट ने इस हत्याकांड की जांच नवंबर 2003 को सीबीआई के हवाले कर दी थी. 2007 में सीबीआई ने कोर्ट में चार्जशीट दाखिल करते हुए गुरमीत सिंह राम रहीम को हत्या की साजिश रचने का आरोपी माना था.
'पूरा सच' अखबार ने किया था खुलासा
सिरसा में हुए दो साध्वियों के साथ हुए रेप की खबर को छत्रपति ने अपने अखबार 'पूरा सच' में छापा था. ये पूरी घटना कई दिनों तक दबी रही थी. इस पूरी घटना का खुलासा जिस गुमनाम चिट्ठी से हुआ वो छत्रपति ने अपने अखबार में प्रकाशित की थी. उस वक्त यह चिट्ठी तत्कालीन पीएम अटल बिहारी वाजपेयी, चीफ जस्टिस पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट, समेत कई संस्थानों में भेजी थी. तीन पेज की चिट्ठी हाथ आने के बाद छत्रपति ने डेरा प्रमुख के बारे में अपने अखबार में छापा था. इसके कुछ दिन बाद ही पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने इस चिट्ठी का संज्ञान लेते हुए सिरसा के डिस्ट्रिक्ट और सेशन जज को इसकी जांच कराने का आदेश दिया. जिसके बाद जज ने यह जांच सीबीआई को सौंपी.
अक्टूबर 2002 में हुई हत्या
अक्टूबर 24, 2002 को छत्रपति पर घर के बाहर कुछ अज्ञात लोगों ने हमला किया. उनकी गोलियों से भून कर हत्या कर दी गई. पिता की हत्या के बाद उनका बेटा अंशुल न्याय के लिए भटकता रहा, लेकिन आखिरकार आज इस मामले में कोर्ट राम रहीम की सजा पर फैसला सुनाएगा.
मामला कब दर्ज हुआ...
पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के चिट्ठी पर संज्ञान लेने के बाद दिसंबर 2002 में सीबीआई की चंडीगढ़ यूनिट ने इस मामले में धारा 376, 506 और 509 के तहत मामला दर्ज किया था और जांच की. इस मामले में राम रहीम को जेल भी हुई थी.
दरअसल, डांस बार मालिकों को किसी भी धार्मिक या शैक्षणिक संस्था से एक किलोमीटर की दूरी पर डांस बार बनाने का आदेश दिया गया था, जिसके बाद डांस बार मालिकों की ओर से इस तरह की प्रतिबंध पर आपत्ति जताई गई और मामला कोर्ट में पहुंच गया. उन्होंने दावा किया है कि बड़े शहरों में इन नियमों का पालन करना संभव नहीं है.
उन्होंने यह भी दावा किया कि 11.30 बजे से डांस बार को बंद करने का एक और प्रतिबंध भेदभावपूर्ण है, जबकि केंद्र सरकार ने व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को चौबीसों घंटे चलाए जाने की अनुमति दे रखी है. डांस बार मालिकों ने सरकार के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि उनका लाइसेंस रिन्यूवल नहीं किया जा रहा है. नए लाइसेंस भी नहीं दिए जा रहे.
Wednesday, January 9, 2019
कॉफी विद करण' में विवादित खुलासे से मुश्किल में हार्दिक पंड्या, BCCI ले सकती है एक्शन
भारतीय टीम के युवा ऑलराउंडर हार्दिक पंड्या क्रिकेट के मैदान पर सुर्खियों में रहते ही हैं, लेकिन अब छोटे परदे पर अपने एक विवादित कमेंट की वजह से चर्चा का विषय बने हुए हैं. इतना ही नहीं पंड्या के इस कमेंट पर से BCCI उन पर कार्रवाई कर सकती है. बीसीसीआई के एक अधिकारी के कहा, 'शो में हार्दिक ने जो बात कही है, उससे बीसीसीआई और भारतीय क्रिकेट की छवि खराब हुई है. माफी पर्याप्त नहीं है और कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए ताकि युवा पीढ़ी के लिए सही उदाहरण स्थापित किया जा सके.
दरअसल, हाल ही में टीवी शो 'कॉफी विद करण' में हार्दिक पंड्या अपने साथी खिलाड़ी केएल राहुल के साथ आए थे. शो के दौरान पंड्या ने कुछ ऐसी बाते कह दी जिससे विवाद पैदा हो गया. पंड्या जब आलोचनाओं से घिरे तो उन्होंने बुधवार को अपने आधिकारिक इंस्टाग्राम अकाउंट पर फैंस से इसके लिए माफी मांगी हैं. पंड्या ने लिखा, 'कॉफी विद करण में मेरे बयान पर ध्यान देते हुए मैं उन सभी से माफी मांगता हूं, जिनका मैंने किसी भी तरह दिल दुखाया है. ईमानदारी से कहूं तो मैं शो के अंदाज को देखते हुए ज्यादा खुल गया. मैं किसी की बेइज्जती नहीं करना चाहता था या किसी की भावनाओं को दुख नहीं पहुंचाना चाहता था. रिस्पेक्ट.'
हुआ यूं कि शो के दौरान होस्ट करण जोहर ने दोनों खिलाड़ियों से उनकी निजी जिंदगी के बारे में सवाल किए थे. पंड्या ने इस दौरान अपनी निजी जिंदगी से जुड़े हुए कुछ सवालों का जवाब दिया.हार्दिक पंड्या ने इस दौरान रिलेशनशिप, डेटिंग और महिलाओं से जुड़े सवालों के जवाब देकर फैंस को हैरान कर दिया. पंड्या ने बताया कि उनके परिवार वालों की सोच काफी खुली हुई है और जब उन्होंने पहली बार लड़की के साथ शारीरीक संबंध बनाए तो घर आकर कहा, आज करके आया है.
पंड्या ने अपने पुराने समय को याद करते हुए यह भी बताया कि वह अपने माता-पिता को पार्टी में लेकर गए, जहां माता-पिता ने बेटे हार्दिक से पूछा कि किस महिला को देख रहा है? उन्होंने एक के बाद एक सभी महिलाओं की तरफ उंगली दिखाकर बताया कि मैं सभी को देख रहा हूं.
इस सेलेक्शन कमेटी में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एके सीकरी, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और लोकसभा में विपक्ष के नेता होंगे. क्योंकि अभी लोकसभा में आधिकारिक तौर पर कोई विपक्ष का नेता नहीं है, ऐसे में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी कांग्रेस के तौर पर मल्लिकार्जुन खड़गे इस कमेटी का सदस्य होंगे.
बता दें कि इस कमेटी में पहले चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया रंजन गोगोई को भी शामिल होना था, लेकिन उन्होंने अपनी जगह जस्टिस एके सीकरी को नॉमिनेट किया है.
मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में अपना फैसला सुनाया, जिसे केंद्र सरकार को बड़े झटके की तौर पर माना गया. सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार द्वारा आलोक वर्मा को सीबीआई निदेशक के पद से छुट्टी पर भेजे जाने का विरोध किया और कहा कि केंद्र के पास ऐसा करने का अधिकार नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने ये आदेश देते हुए आलोक वर्मा को इस पद पर दोबारा बहाल किया.
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद बुधवार को आलोक वर्मा ने सीबीआई के दफ्तर पहुंच कर कार्यभार संभाला. बता दें कि आलोक वर्मा अभी कोई नीतिगत फैसला नहीं ले सकते हैं. दरअसल, कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि आलोक वर्मा पर जो भी आरोप लगे हैं उनकी जांच सेलेक्शन कमेटी करेगी और आगे का फैसला लेगी. गौरतलब है कि आलोक वर्मा इसी महीने सीबीआई निदेशक के पद से रिटायर हो रहे हैं.
दरअसल, हाल ही में टीवी शो 'कॉफी विद करण' में हार्दिक पंड्या अपने साथी खिलाड़ी केएल राहुल के साथ आए थे. शो के दौरान पंड्या ने कुछ ऐसी बाते कह दी जिससे विवाद पैदा हो गया. पंड्या जब आलोचनाओं से घिरे तो उन्होंने बुधवार को अपने आधिकारिक इंस्टाग्राम अकाउंट पर फैंस से इसके लिए माफी मांगी हैं. पंड्या ने लिखा, 'कॉफी विद करण में मेरे बयान पर ध्यान देते हुए मैं उन सभी से माफी मांगता हूं, जिनका मैंने किसी भी तरह दिल दुखाया है. ईमानदारी से कहूं तो मैं शो के अंदाज को देखते हुए ज्यादा खुल गया. मैं किसी की बेइज्जती नहीं करना चाहता था या किसी की भावनाओं को दुख नहीं पहुंचाना चाहता था. रिस्पेक्ट.'
हुआ यूं कि शो के दौरान होस्ट करण जोहर ने दोनों खिलाड़ियों से उनकी निजी जिंदगी के बारे में सवाल किए थे. पंड्या ने इस दौरान अपनी निजी जिंदगी से जुड़े हुए कुछ सवालों का जवाब दिया.हार्दिक पंड्या ने इस दौरान रिलेशनशिप, डेटिंग और महिलाओं से जुड़े सवालों के जवाब देकर फैंस को हैरान कर दिया. पंड्या ने बताया कि उनके परिवार वालों की सोच काफी खुली हुई है और जब उन्होंने पहली बार लड़की के साथ शारीरीक संबंध बनाए तो घर आकर कहा, आज करके आया है.
पंड्या ने अपने पुराने समय को याद करते हुए यह भी बताया कि वह अपने माता-पिता को पार्टी में लेकर गए, जहां माता-पिता ने बेटे हार्दिक से पूछा कि किस महिला को देख रहा है? उन्होंने एक के बाद एक सभी महिलाओं की तरफ उंगली दिखाकर बताया कि मैं सभी को देख रहा हूं.
इस सेलेक्शन कमेटी में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एके सीकरी, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और लोकसभा में विपक्ष के नेता होंगे. क्योंकि अभी लोकसभा में आधिकारिक तौर पर कोई विपक्ष का नेता नहीं है, ऐसे में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी कांग्रेस के तौर पर मल्लिकार्जुन खड़गे इस कमेटी का सदस्य होंगे.
बता दें कि इस कमेटी में पहले चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया रंजन गोगोई को भी शामिल होना था, लेकिन उन्होंने अपनी जगह जस्टिस एके सीकरी को नॉमिनेट किया है.
मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में अपना फैसला सुनाया, जिसे केंद्र सरकार को बड़े झटके की तौर पर माना गया. सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार द्वारा आलोक वर्मा को सीबीआई निदेशक के पद से छुट्टी पर भेजे जाने का विरोध किया और कहा कि केंद्र के पास ऐसा करने का अधिकार नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने ये आदेश देते हुए आलोक वर्मा को इस पद पर दोबारा बहाल किया.
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद बुधवार को आलोक वर्मा ने सीबीआई के दफ्तर पहुंच कर कार्यभार संभाला. बता दें कि आलोक वर्मा अभी कोई नीतिगत फैसला नहीं ले सकते हैं. दरअसल, कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि आलोक वर्मा पर जो भी आरोप लगे हैं उनकी जांच सेलेक्शन कमेटी करेगी और आगे का फैसला लेगी. गौरतलब है कि आलोक वर्मा इसी महीने सीबीआई निदेशक के पद से रिटायर हो रहे हैं.
Tuesday, January 1, 2019
कादर ख़ान को क्या बीमारी थी?
इस ख़बर की पुष्टि कादर ख़ान के बेटे सरफ़राज़ ख़ान ने की. उन्होंने समाचार एजेंसी PTI से कहा, ''मेरे पिता हमें छोड़कर चले गए हैं. लंबी बीमारी के बाद 31 दिसंबर शाम छह बजे (कनाडाई समय) उनका निधन हो गया. वो दोपहर को कोमा में चले गए थे. पिछले 16-17 हफ्तों से अस्पताल में भर्ती थे.''
सरफ़राज़ ने कहा, ''उनका अंतिम संस्कार कनाडा में ही किया जाएगा. हमारा सारा परिवार यहीं हैं और हम यहीं रहते हैं इसलिए हम ऐसा कर रहे हैं. हम दुआओं और प्रार्थना के लिए सभी का शुक्रिया अदा करते हैं.''
81 साल के कादर ख़ान को सांस लेने में तकलीफ़ हो रही थी, जिसके बाद डॉक्टरों ने उन्हें नियमित वेंटिलेटर से हटाकर बीआईपीएपी वेटिंलेंटर पर रखा हुआ था.
कादर ना केवल हाल में बीमार थे, बल्कि काफ़ी दिनों से एक ऐसी बीमारी से जूझ रहे थे, जो शरीर के कई हिस्सों पर असर डालती है. इसे प्रोग्रेसिव सुपरान्यूक्लियर पॉल्सी (PSP) कहते हैं.
ब्रिटेन की स्वास्थ्य सेवा नेशनल हेल्थ सर्विस के मुताबिक प्रोग्रेसिव सुपरान्यूक्लियर पाल्सी एक दुर्लभ स्थिति है, जिसमें संतुलन, चलने-फिरने, देखने, बोलने और निगलने में दिक्कतें पेश आती हैं. इसकी वजह है वक़्त के साथ-साथ दिमाग के सेल्स को नुकसान पहुंचना. 60 साल से ज़्यादा उम्र के लोगों को ये बीमारी ज़्यादा तंग करती है.
किसकी वजह से होती है PSP?
प्रोग्रेसिव सुपरान्यूक्लियर पाल्सी तब होती है, जब तउ नामक प्रोटीन के बिल्ड-अप की वजह से दिमाग के एक हिस्से में ब्रेन सेल्स ख़राब हो जाते हैं.
तउ आम तौर पर दिमाग़ में होते हैं, और उच्चतर स्तर तक पहुंचने से पहले ये टूटकर बिखर जाते हैं. लेकिन जो लोग PSP से जूझ रहे होते हैं, उनके मामले में ये ठीक तरह से नहीं टूटते और ब्रेन सेल्स में ख़तरनाक गुच्छे बन जाते हैं.
इस बीमारी से ग्रस्त लोगों के मामले में ये गुच्छे अलग आकार, संख्या में हो सकते हैं और साथ ही इनकी जगह भी भिन्न हो सकती है. इसका मतलब ये हुआ कि बीमारी के लक्षण भी अलग-अलग हो सकते हैं.
सबसे बड़ी दिक्कत ये है कि कोई एक ऐसा टेस्ट नहीं, जो प्रोग्रेसिव सुपरान्यूक्लियर पाल्सी की पुष्टि कर सके. बल्कि इस बीमारी का पता लगाने के लिए लक्षण और उनकी पड़ताल पर निर्भर रहना होता है.
डॉक्टरों को इसका पता लगाने में इसलिए भी परेशानी आती है, क्योंकि बहुत से लक्षण पार्किंसन्स से मेल खाते हैं. साथ ही लक्षण इतने ज़्यादा होते हैं कि बीमारी की पुष्टि करने में काफ़ी समय लग जाता है.
कहीं कोई दूसरी बीमारी तो नहीं है, इसका पता लगाने के लिए ब्रेन स्कैन कराने की ज़रूरत पड़ सकती है. इस बीमारी से ग्रस्त होने की आशंका होने पर न्यूरोलॉजिस्ट की मदद लेनी चाहिए.
सरफ़राज़ ने कहा, ''उनका अंतिम संस्कार कनाडा में ही किया जाएगा. हमारा सारा परिवार यहीं हैं और हम यहीं रहते हैं इसलिए हम ऐसा कर रहे हैं. हम दुआओं और प्रार्थना के लिए सभी का शुक्रिया अदा करते हैं.''
81 साल के कादर ख़ान को सांस लेने में तकलीफ़ हो रही थी, जिसके बाद डॉक्टरों ने उन्हें नियमित वेंटिलेटर से हटाकर बीआईपीएपी वेटिंलेंटर पर रखा हुआ था.
कादर ना केवल हाल में बीमार थे, बल्कि काफ़ी दिनों से एक ऐसी बीमारी से जूझ रहे थे, जो शरीर के कई हिस्सों पर असर डालती है. इसे प्रोग्रेसिव सुपरान्यूक्लियर पॉल्सी (PSP) कहते हैं.
ब्रिटेन की स्वास्थ्य सेवा नेशनल हेल्थ सर्विस के मुताबिक प्रोग्रेसिव सुपरान्यूक्लियर पाल्सी एक दुर्लभ स्थिति है, जिसमें संतुलन, चलने-फिरने, देखने, बोलने और निगलने में दिक्कतें पेश आती हैं. इसकी वजह है वक़्त के साथ-साथ दिमाग के सेल्स को नुकसान पहुंचना. 60 साल से ज़्यादा उम्र के लोगों को ये बीमारी ज़्यादा तंग करती है.
किसकी वजह से होती है PSP?
प्रोग्रेसिव सुपरान्यूक्लियर पाल्सी तब होती है, जब तउ नामक प्रोटीन के बिल्ड-अप की वजह से दिमाग के एक हिस्से में ब्रेन सेल्स ख़राब हो जाते हैं.
तउ आम तौर पर दिमाग़ में होते हैं, और उच्चतर स्तर तक पहुंचने से पहले ये टूटकर बिखर जाते हैं. लेकिन जो लोग PSP से जूझ रहे होते हैं, उनके मामले में ये ठीक तरह से नहीं टूटते और ब्रेन सेल्स में ख़तरनाक गुच्छे बन जाते हैं.
इस बीमारी से ग्रस्त लोगों के मामले में ये गुच्छे अलग आकार, संख्या में हो सकते हैं और साथ ही इनकी जगह भी भिन्न हो सकती है. इसका मतलब ये हुआ कि बीमारी के लक्षण भी अलग-अलग हो सकते हैं.
सबसे बड़ी दिक्कत ये है कि कोई एक ऐसा टेस्ट नहीं, जो प्रोग्रेसिव सुपरान्यूक्लियर पाल्सी की पुष्टि कर सके. बल्कि इस बीमारी का पता लगाने के लिए लक्षण और उनकी पड़ताल पर निर्भर रहना होता है.
डॉक्टरों को इसका पता लगाने में इसलिए भी परेशानी आती है, क्योंकि बहुत से लक्षण पार्किंसन्स से मेल खाते हैं. साथ ही लक्षण इतने ज़्यादा होते हैं कि बीमारी की पुष्टि करने में काफ़ी समय लग जाता है.
कहीं कोई दूसरी बीमारी तो नहीं है, इसका पता लगाने के लिए ब्रेन स्कैन कराने की ज़रूरत पड़ सकती है. इस बीमारी से ग्रस्त होने की आशंका होने पर न्यूरोलॉजिस्ट की मदद लेनी चाहिए.
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