Tuesday, February 26, 2019

अरुणाचल में पीआरसी के मुद्दे पर बवाल क्यों मचा है?

अरुणाचल प्रदेश में स्थायी आवासीय प्रमाण पत्र (पर्मानेंट रेज़िडेन्स सर्टिफ़ीकेट या पीआरसी) के मुद्दे पर हिंसा भड़कने के बाद राज्य के मुख्यमंत्री पेमा खांडु ने कहा है कि वो आगे भी अब इस मुद्दे को नहीं उठाएंगे.

समाचार एजेंसी एएनआई के अनुसार पेमा खांडु का कहना था, ''22 फ़रवरी की रात को मैंने मीडिया तथा सोशल मीडिया के ज़रिये स्पष्ट किया था कि सरकार इस मुद्दे पर आगे चर्चा नहीं करेगी... आज भी मुख्य सचिव की मार्फ़त एक आदेश जारी किया गया है कि हम पीआरसी मामले पर आगे कार्यवाही नहीं करेंगे..."

भाजपा के राज्य उपाध्यक्ष डॉमिनिक तादर के अनुसार कथित पुलिस फ़ायरिंग में अब तक छह लोग मारे गए हैं.

सरकार ने हिंसा के कारणों की जांच के लिए कमिश्नर स्तर जांच समिति का गठन किया है. सरकार ने मामले से निपटने के लिए सोमवार को सर्वदलीय बैठक भी बुलाई है.

अर्धसैनिक बलों की तैनाती कर दी गई है. कई इलाक़ों में सेना ने फ़्लैगमार्च किया है.

केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने लोगों से शांति बनाए रखने की अपील की है.

अरुणाचल प्रदेश पहले असम राज्य का हिस्सा था और 1987 में इसे अलग राज्य का दर्जा मिला.

नए राज्य के दो ज़िलों नामसाइ और छांगलांग में दशकों से छह ग़ैर-अरुणाचली जन-जाति के लोग रह रहे हैं. उनकी आबादी क़रीब 20-25 हज़ार है.

उनके पास ज़मीन तो है क्योंकि उस पर वो दशकों से रह रहे हैं लेकिन उनके पास पीआरसी नहीं है जिसके कारण उन्हें कई तरह की परेशानी होती है.

अरुणाचल प्रदेश की सरकार ने मई 2018 में एक संयुक्त उच्चाधिकार समिति का गठन किया था. समिति की ज़िम्मेदारी ये तय करना था कि उन ग़ैर-अरुणाचली जन-जातियों के लिए क्या रास्ता निकाला जाए.

समिति ने सिफ़ारिश की है कि ग़ैर-अरुणाचली छह समुदायों को भी राज्य में पीआरसी दी जाए.

इसके विरोध में छात्रों और सिविल सोसाइटी समेत राज्य के कई संगठनों ने गुरुवार से लेकर शनिवार तक 48 घंटों के बंद का आह्वान किया था.

बीजेपी उपाध्यक्ष तादर के अनुसार ग़ैर-अरुणाचली लोग को अगर पीआरसी मिलती है तो इससे वो कई तरह की दिक़्क़तों का सामना करने से बच जाएंगे.

अरुणाचल ईस्ट लोकसभा सीट से कांग्रेस के सांसद निनोंग इरिंग का भी मानना है कि इस पर विचार किया जा सकता है.

लेकिन विरोध कर रहे संगठनों का कहना है कि सिफ़ारिश मानी गई तो स्थानीय स्थायी निवासियों के अधिकारों पर विपरीत असर पड़ेगा. पूर्व छात्र नेता रितेमसो मान्यू ने कहा कि अरुणाचल में पहले से ही रोज़गार की समस्या है और अगर इन जन-जातियों को पीआरसी दी गई तो वो राज्य की दूसरी जन-जातियों के बराबर हो जाएंगे और सारे अधिकार उन्हें भी मिलने लगेंगे. रितेमसो के अनुसार इससे अरुणाचली लोगों को नुक़साना होगा.

शुक्रवार रात प्रदर्शनकारी सचिवालय में घुसने की कोशिश करने लगे. पुलिस ने उन्हें रोकने के लिए गोली चलाई जिसमें एक व्यक्ति की मौत हो गई और कई लोग घायल हो गए.

इसके बाद हिंसा और भड़क गई. प्रदर्शनकारियों ने पुलिस थाने को आग लगा दी. उप-मुख्यमंत्री चौना मेन के निजी घर में भी तोड़-फोड की गई.

विश्लेषकों का मानना है कि हिंसा ने इस वजह से और भयानक रुप ले लिया क्योंकि पेमा खांडू ने नागरिकता संशोधन बिल का भी समर्थन किया था, जबकि मणिपुर के मुख्यमंत्री ने बीजेपी के होते हुए भी इस बिल का विरोध किया था.

स्थानीय अरुणाचली लोगों में इस बात को भी लेकर ग़ुस्सा था जिसने पीआरसी के मुद्दे पर हिंसक रुप ले लिया.

Wednesday, February 20, 2019

नामवर सिंह: हिंदी के 'नामवर' यानी हिंदी के प्रकाश स्तंभ

यह हिंदी के प्रतिमानों की विदाई का त्रासद समय है. सोलह महीनों के छोटे से अंतराल में कुंवर नारायण, केदारनाथ सिंह, विष्णु खरे, कृष्णा सोबती और अब नामवर सिंह के निधन से जो जगहें खाली हुई हैं वे हमेशा खाली ही रहेंगी.

इनमें से कई लोग नब्बे वर्ष के परिपक्व और कई उपलब्धियां देख चुके जीवन को पार कर चुके थे, लेकिन उनका न होना प्रकाश स्तंभों के बुझने की तरह है.

आधुनिक कविता की व्यावहारिक आलोचना की सबसे अधिक लोकप्रिय किताब 'कविता के नए प्रतिमान' लिखने वाले डॉ. नामवर सिंह कई दशकों तक खुद हिंदी साहित्य के प्रतिमान बने रहे. वे हिंदी के उन चंद कृती व्यक्तित्वों में थे जिनके पास न सिर्फ हिंदी, बल्कि भारतीय भाषाओं के साहित्य की एक विहंगम और समग्र दृष्टि थी और इसीलिए दूसरी भाषाओं में हिंदी के जिस व्यक्ति को सबसे पहले याद किया जाता रहा, वे नामवर सिंह ही हैं.

एक तरह से वे हिंदी के ब्रांड एम्बेसेडर थे. प्रगतिशील-प्रतिबद्ध साहित्य का एजेंडा तय करने का काम हो या 'आलोचना' के संपादक के तौर पर साहित्यिक वैचारिकता का पक्ष या जवाहर लाल नेहरू विश्ववुद्यालय (जेएनयू) में प्रोफ़ेसरी, सबमें उनका कोई सानी नहीं था.

उनका साहित्य पढ़ाने का तरीका शुष्क और किताबी नहीं, बल्कि इतना सम्प्रेशनीय और प्रभावशाली होता था कि उनके ही नहीं, दूसरी कक्षाओं के छात्र और प्राध्यापक भी उन्हें सुनने आ जाते थे. जेएनएयू के हिंदी विभाग की धाक काफी समय तक बनी रहने का श्रेय नामवरजी को ही जाता है जिन्होंने विभाग की बुनियाद भी रखी थी.

एक लम्बे समय तक नामवर सिंह को अध्ययन और अध्यवसाय का पर्याय माना जाता रहा. जेएनयू से पहले उन्हें बहुत से लोगों ने दिल्ली के तिमारपुर इलाके में एक कमरे के घर में देखा होगा जहां दीवार पर लातिन अमेरिकी छापामार क्रांतिकारी चे ग्वारा की काली-सफ़ेद तस्वीर लटकती थी और वे एक तख्त पर किताबों से घिरे हुए किसी एकांत साधक की तरह रहते थे.

कई लोग यह मानते हैं की उस दौर का गहन अध्ययन जीवन भर उनके काम आता रहा. उनके संपादन में 'आलोचना' का बहुत सम्मान था और उसमें किसी की रचना का प्रकाशित होने का अर्थ था: साहित्य में स्वीकृति की मुहर.

उन दिनों जब इन पंक्तियों का लेखक दिल्ली आया तो साहित्य अकादेमी के तत्कालीन उपसचिव और नयी कविता के एक प्रमुख कवि भारत भूषन अग्रवाल ने कहा, "अरे, आप अपनी कवितायें मुझे दीजिये. मैं उन्हें 'आलोचना' में छपवाऊंगा!" दिलचस्प यह था कि तब तक इस लेखक की कवितायें 'आलोचना' के नए अंक में प्रकाशित हो गयी थीं.

जिस तरह निराला अपना जन्मदिन अपनी प्रिय ऋतु वसंत की पंचमी को मनाते थे वैसे ही नामवर सिंह का जन्मदिन पहली मई को मनाया जाता रहा. यह मजदूर दिवस की तारीख है और संयोग से स्कूल में नामांकन के समय उनके जन्म की यही तारीख लिखवाई गयी थी.

बाद में वे वास्तविक तारीख 26 जुलाई को जन्मदिन मनाने लगे. युवावस्था में उन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में अध्यापन किया और कम्युनिस्ट पार्टी के उम्मीदवार के तौर पर लोकसभा चुनाव के मैदान में उतरे और हार गए, जिसके नतीजे में उन्हें विश्वविद्यालय की नौकरी से हटना पड़ा. फिर दिल्ली आकर उन्होंने कुछ समय पार्टी के मुखपत्र 'जनयुग' का संपादन किया.

सागर और वहां से इस्तीफ़ा देने को विवश किये जाने के बाद जोधपुर विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग का प्रमुख बनना नामवर सिंह के जीवन का एक अहम मोड़ था.

पाठ्यक्रम में प्रगतिशील साहित्य को शामिल करने आदि कुछ मुद्दों के कारण उन्हें वहां से भी मुक्त होना पड़ा. फिर उन्हें जेएनयू में हिंदी विभाग की बुनियाद रखने का ज़िम्मा मिला और वे वर्षों तक उसके अध्यक्ष रहे. उसके बाद की कहानी उनकी दुनियावी कामयाबी की मिसाल है.

'कविता के नए प्रतिमान' का प्रकाशन (1968) किसी परिघटना से कम नहीं था जिसने समकालीन हिंदी कविता की आलोचना में एक प्रस्थापना-परिवर्तन किया. उससे पहले तक आधुनिक, छायावादोत्तर कविता को प्रगतिशील नज़रिए से पढने-परखने की व्यवस्थित दृष्टि का अभाव था और अकादमिक क्षेत्र में डॉ. नगेन्द्र की रस-सिद्धांतवादी मान्यताओं का बोलबाला था.

ये मान्यताएं नयी काव्य संवेदना को देख पाने में असमर्थ थीं इसलिए उसे खारिज करती थीं. 'कविता के नए प्रतिमान' ने नगेन्द्र की रूमानी आलोचना का ज़बरदस्त खंडन किया और आधुनिक काव्य भूमियों की पड़ताल के लिए पुराने औजारों को निरर्थक मानते हुए 'नए' प्रतिमानों की ज़रूरत रेखांकित की.

इस पद का ज़िक्र हालांकि सबसे पहले कवि-आलोचक विजयदेव नारायण साही ने लक्ष्मीकांत वर्मा की पुस्तक 'नयी कविता के प्रतिमान' के सन्दर्भ में करते हुए कहा था कि अब 'नयी' कविता के प्रतिमानों का नहीं, बल्कि कविता के 'नए' प्रतिमानों की ज़रुरत है. लेकिन नामवर सिंह ने साही के भाववाद से हटकर उन्हें एक सुव्यवस्थित शक्ल देकर समाज-सापेक्ष पड़ताल का हिस्सा बनाया.

साही परिमल ग्रुप के पुरोधा थे जिसके प्रगतिशील लेखकों से गहरे मतभेद थे. एक तरह से नामवर सिंह ने परिमलीय नयेपन को प्रगतिशील अंतर्वस्तु देने का काम किया.

वह विश्व राजनीति में पूंजीवादी और समाजवादी ब्लॉक के बीच शीतयुद्ध का दौर था जिसकी छाया से साहित्य भी अछूता नहीं रहा. हिंदी के शीतयुद्ध में एक तरफ परिमलीय लेखक और हीरानन्द सच्चिदानंद वात्स्यायन अज्ञेय थे तो दूसरी तरफ प्रगतिशील साहित्य का मोर्चा था, जिसकी बागडोर तमाम आपसी मतभेदों के बावजूद डॉ. रामविलास शर्मा और डॉ. नामवर सिंह के हाथों में रही.

'कविता के नए प्रतिमान' इसी दौर की कृति हैं जिसने डॉ. नगेन्द्र के साथ-साथ अज्ञेय के साहित्यिक आभामंडल को ढहाने का काम किया. नामवर जी ने अज्ञेय के नव-छायावाद के बरक्स रघुवीर सहाय की कविता को, और बाद में गजानन माधव मुक्तिबोध को भी केंद्रीयता देते हुए नया विमर्श शुरू किया.

रघुवीर सहाय हालांकि अज्ञेय की पाठशाला से ही निकले थे, लेकिन उनके सरोकार कहीं ज्यादा सामजिक और लोकतांत्रिक नागरिकता से जुड़े थे इसलिए नामवर जी ने कविता की सामाजिकता और लोकतंत्र पर जिस बहस की शुरुआत की वह लम्बे समय तक सार्थक बनी रही.

पत्रकारिता का अनुभव होने के कारण उनकी भाषा अकादमिक जटिलता से मुक्त और ज्यादा सम्प्रेशनीय थी. यह किताब आलोचना को एक रणनीति को सामने रखती थी और बाद में खुद नामवर जी उसे 'पोलिमिकल' यानी दाँव-पेच और उखाड़-पछाड़ से भरी हुई मानने लगे. वर्षों बाद उन्होंने जैसे भूल-सुधार करते हुए अज्ञेय की कविता पर पुनर्विचार किया और उनके समग्र अवदान को भी रेखांकित किया.

Thursday, February 14, 2019

जेफ बेजोस ने 2018 में सबसे ज्यादा 14200 करोड़ रु दान किए, बिल गेट्स से 93% ज्यादा

दुनिया के सबसे बड़े अमीर अमेजन के सीईओ जेफ बेजोस अमेरिका के सबसे बड़े दानदाता भी बन गए हैं। 2018 में उन्होंने समाज की भलाई के कामों के लिए सबसे ज्यादा 14,200 करोड़ रुपए डोनेट किए। यूएस की क्रॉनिकल ऑफ फिलान्थ्रॉपी मैग्जीन ने उन 50 अमीरों की लिस्ट जारी की है जिन्होंने पिछले साल सबसे ज्यादा डोनेशन दी। इसमें बेजोस का पहला नंबर है।

बिल-मिलिंडा गेट्स की डोनेशन 97% घटी
50 सबसे बड़े दानदाताओं की लिस्ट में माइक्रोसॉफ्ट के फाउंडर बिल गेट्स और उनकी पत्नी मिलिंडा गेट्स 12वें नंबर पर फिसल गए। 2018 में उन्होंने 979.8 करोड़ रुपए दान में दिए। यह 2017 के मुकाबले 97% कम है। 2017 में वो पहले नंबर पर थे। उन्होंने 33,938 करोड़ रुपए की डोनेशन दी थी।

मार्क जकरबर्ग-प्रिसिला चान दूसरे से 7वें नंबर पर फिसले
फेसबुक के सीईओ मार्क जकरबर्ग और उनकी पत्नी प्रिसिला चान की डोनेशन में 89% कमी आई है। 2018 में उन्होंने 1,519.4 करोड़ रुपए की डोनेशन दी। वो दूसरे से 7वें नंबर पर फिसल गए हैं। 2017 में उन्होंने 14,200 करोड़ रुपए डोनेट किए थे।

लिस्ट में शामिल सभी 50 अमीरों ने 2018 में कुल 55,380 करोड़ दान में दिए। यह राशि 2017 के मुकाबले लगभग आधी है। उस साल 50 अमीरों ने 1.04 लाख करोड़ रुपए डोनेट किए थे।

जेफ बेजोस पहली बार इस लिस्ट में शामिल हुए हैं और पहली ही बार में नंबर-1 हो गए हैं। उन्होंने पिछले साल लॉन्च किए बेजोस डे-वन फंड के जरिए जरूरतमंदों की मदद की। इससे पहले सामाजिक कार्यों में पीछे रहने की वजह से बेजोस को काफी निंदा झेलनी पड़ी थी।

बेजोस की नेटवर्थ 9.65 लाख करोड़ रुपए
जेफ बेजोस लंबे समय से दुनिया के सबसे बड़े अमीर बने हुए हैं। उनकी नेटवर्थ 9.65 लाख करोड़ रुपए है।

डायरी में हर व्यक्ति का नाम नोट कर रहीं
प्रियंका नेताओं से खुशमिजाज तरीके से मिल रही हैं। उनके चेहरे पर कोई तनाव दिखने की बजाय मुस्कराहट रहती है। जिस भी नेता की बातचीत में प्रियंका को दम लग रहा है, उसका नाम वे अपनी पर्सनल डायरी में नोट कर रही हैं। वे संगठन और प्रत्याशी के बीच कांग्रेस को और मजबूत करने को लेकर चर्चा कर रही हैं।

सीटों पर सपा-बसपा की ताकत के बारे में चर्चा
प्रियंका से मुलाकात के बाद पूर्व सांसद अन्नू टंडन ने बताया कि प्रियंका जी का अंदाज बहुत ही अलग है। वे मीटिंग में मौजूद हर व्यक्ति-पदाधिकारी से डिटेल में बात कर रही हैं। उन्होंने हमसे मुलाकात में जाना कि उत्तर प्रदेश में पार्टी संगठन में अब तक क्या काम होता था और उसे करने का तरीका क्या था? जिला अध्यक्ष सूर्य नारायण यादव ने बताया कि हमसे सपा-बसपा के गठबंधन के बारे में पूछा गया। इसके बाद पूछा गया कि क्या हम गठबंधन से अलग रहकर चुनाव लड़ने की स्थिति में हैं? इस पर हमने कहा कि हम उन्नाव की सीट आपको हर हाल में जीतकर देंगे। इसके बाद पूर्व प्रदेश सचिव राज कुमार लोधी ने बताया कि बसपा उन्नाव में बिल्कुल मजबूत नहीं है।

हर बूथ मजबूत करने का संदेश
पूर्व सांसद अन्नू टंडन के मुताबिक, प्रियंका ने नेताओं से कहा है कि मुझे हर बूथ मजबूत करना है और हर बूथ जीतना है। यही वजह है कि वे नेताओं-कार्यकर्ताओं से उनसे बूथ के बारे में सवाल कर रही हैं।

एक-दूसरे की पोल खोलने में लगे रहे कांग्रेसी
प्रियंका के सामने कांग्रेस कार्यकर्ता एक-दूसरे की पोल खोलने में लगे रहे। एक जिला अध्यक्ष अपना बूथ नहीं बता पाए। प्रियंका के पूछने पर बगलें झांकने लगे। कई कार्यकर्ता भी अपना बूथ नहीं बता पाए। कई नेता इस सवाल का जवाब भी नहीं दे पाए कि कांग्रेस ने उनके जिले में आखिरी कार्यक्रम कब किया था।

Wednesday, February 6, 2019

खुशखबरी: अब कम होगी आपकी EMI, जानें- RBI के ऐलान की बड़ी बातें

भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) ने रेपो रेट में 0.25% कटौती के फैसले पर अपनी मुहर लगाई है. जिससे अब रेपो 6.50% से घटकर 6.25% हो गया है. दरअसल आरबीआई ने रेपो रेट में 25 बेसिस पॉइंट की कटौती की है. एमपीसी के 6 में से 4 सदस्यों ने रेपो रेट में कटौती के फैसले का समर्थन किया, जबकि विरल आचार्य और चेतन घाटे रेपो रेट में कटौती के पक्ष में नहीं थे.

होम लोन होगा सस्ता

आरबीआई की ओर से रेपो रेट में कटौती का फायदा अब आम आदमी को भी मिलने वाला है. जल्द ही बैंक होम लोन के ब्याज दरों में कमी का ऐलान कर सकते हैं. होम लोन के ब्याज दर में कटौती से लोगों की EMI कम होगी. क्योंकि अब बैंकों को आरबीआई से सस्ती फंडिंग मिलेगी, जिसका सीधा असर बैंक लोन पर पड़ेगा. बैंक लोन सस्ता होने से आपकी EMI या लोन रीपेमेंट पीरियड में कटौती का फायदा मिलेगा.

GDP को लेकर RBI का ये अनुमान 

जबकि रिवर्स रेपो रेट भी घटाकर 6.00 फीसदी कर दिया गया है. आरबीआई के गनर्वर शक्तिकांत दास ने कहा कि वित्त वर्ष 2019-20 के लिए जीडीपी वृद्धि दर 7.4 रहने का अनुमान है. जबकि उन्होंने बताया कि खुदरा महंगाई दर के जनवरी-मार्च में 2.4 फीसदी और अप्रैल-सितंबर में 3.2-3.4 फीसदी रहने का अनुमान है.

शक्तिकांत दास ने बताया कि आरबीआई ने किसानों के लिए कर्ज की सीमा बढ़ा दी है. बिना किसी गिरवी के किसानों के लिए कृषि कर्ज सीमा की 60,000 रुपये बढ़ा दी गई है. किसान अब बिना किसी गारंटी के 1.60 लाख रुपये तक का लोन ले सकते हैं.

वहीं रेपो रेट में कटौती के साथ आरबीआई का कहना है कि बैंकों को जमा दरें संतुलित रखने की जरूरत है. एनबीएफसी में बैंकों के एक्सपोजर नियम बदले गए हैं, फरवरी अंत तक एनबीएफसी के लिए नए नियम जारी कर दिए जाएंगे.

दिसंबर में आरबीआई ने दिया था संकेत

अब तक आरबीआई का रेपो रेट 6.50 फीसदी था, और लोग आरबीआई से कटौती की उम्मीद कर रहे थे. इससे पहले, दिसंबर 2018 में अपनी मौद्रिक नीति समीक्षा में आरबीआई ने ब्याज दरों में परिवर्तन नहीं किया था, लेकिन उस वक्त आरबीआई की ओर से कहा गया था कि अगर मुद्रास्फीति का जोखिम नहीं हुआ तो भविष्य में रेपो रेट में कटौती संभव है. और अब आरबीआई ने रेपो रेट में 25 बेसिस पॉइंट की कटौती कर दी है.

गौरतलब है कि इससे पहले आरबीआई ने 1 अगस्त 2018 को रेपो रेट 0.25 फीसदी बढ़ाकर 6.50 फीसदी कर दिया था. केंद्रीय बैंक ने पिछली तीन मौद्रिक समिति बैठक में नीतिगत दरों में कोई बदलाव नहीं किया था. हालांकि इससे पहले मौजूदा वित्त वर्ष में दो बार 0.25-0.25 फीसदी की बढ़ोतरी जरूर की गई थी.